समुन्दर गौर किया है कभी? समुन्दर कितना अकेला है! वो जो लहरों का गीत हैं न वो गीत नहीं पुकार है उसकी। पुकार जो वो लगाता है तुमको। कभी अकेले बैठे उसके किनारे? हरदम कुछ कहता है समुन्दर वो जो पानी बहकर छूता है वो इशारा है साथ होने का वो जो तेज़ लहर के झोंके हैं वादा है, आँसू पिरोने का गौर किया है कभी? -हर्ष वर्धन सिंह
लेखक और कवि जैसी ज़िम्मेदारी अभी मैं उठा नहीं सकता, यहाँ मैं सिर्फ़ अपने ख़यालों को लिख भर देता हूँ, जो कभी कविता का रूप ले लेती हैं, कभी कहानी का। पढ़ें और उन सबको पढ़ाएँ जिनको इन कविताओं कहानियों की ज़रूरत है।