मिट्टी का मैं पुतला हूँ,
जलता हूँ, पिघलता हूँ,
मिट्टी का ही अंश लेकर
धीरे-धीरे निखरता हूँ।
तपाया गया, सताया गया,
कई रातों मैं रुलाया गया।
भीतर मेरे शंकर और कन्हैया।
मेरे अंदर डमरू और मुरलिया।
जाने कितनी प्यास भरूँ मैं,
जाने किसके प्राण धरूँ।
एक तरफ़ मेरी करे पूजा,
गमले में लगे पौध वह दूजा।
मुझमें भरी है तेरी आस्था।
मुझमें छिपा है तेरा रास्ता।
तेरी भूल तू कहे मुझे माटी
तेरी धूल तुझे मैंने है बाटी।
तू चाहे आकाश पर चल दे,
चाहे तू विजय विश्व पर धर ले,
जिसदिन मुझको भूल जाएगा,
स्वयं को तू मुझमें ही पायेगा।
-हर्ष वर्धन सिंह
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