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मिट्टी का गीत

मिट्टी का मैं पुतला हूँ,
जलता हूँ, पिघलता हूँ,
मिट्टी का ही अंश लेकर
धीरे-धीरे निखरता हूँ।
तपाया गया, सताया गया,
कई रातों मैं रुलाया गया।
भीतर मेरे शंकर और कन्हैया।
मेरे अंदर डमरू और मुरलिया।
‌जाने कितनी प्यास भरूँ मैं,
जाने किसके प्राण धरूँ।
एक तरफ़ मेरी करे पूजा,
गमले में लगे पौध वह दूजा।
मुझमें भरी है तेरी आस्था।
मुझमें छिपा है तेरा रास्ता।
तेरी भूल तू कहे मुझे माटी
तेरी धूल तुझे मैंने है बाटी।
तू चाहे आकाश पर चल दे,
चाहे तू विजय विश्व पर धर ले,
जिसदिन मुझको भूल जाएगा,
स्वयं को तू मुझमें ही पायेगा।

-हर्ष वर्धन सिंह

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गुज़रता वक़्त | हर्ष वर्धन सिंह

गुज़रता वक़्त अब जो तुम नहीं हो तो अक्सर सोचता हूँ मैं, कि जितनी कोशिशें कीं तुम्हे रोक लेने की क्या वो काफ़ी थी? अक्सर यूँ फ़ोन मिलाना, बेवक़्त बातें बनाना, यूँ मिलने की गुजारिश करना क्या काफ़ी थी? सोचा तो लगा हाँ, काफ़ी थी! काफ़ी थी, वो सारी कोशिशें तुम्हे कुछ और पल रोकने के लिए आखिर, गुज़रे वक़्त कि तरह लोग भी ज़िन्दगी से हो कर गुज़र ही जाते हैं। -©हर्ष वर्धन सिंह तस्वीर: दी नेमसेक (2006)