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गुज़रता वक़्त | हर्ष वर्धन सिंह

गुज़रता वक़्त अब जो तुम नहीं हो तो अक्सर सोचता हूँ मैं, कि जितनी कोशिशें कीं तुम्हे रोक लेने की क्या वो काफ़ी थी? अक्सर यूँ फ़ोन मिलाना, बेवक़्त बातें बनाना, यूँ मिलने की गुजारिश करना क्या काफ़ी थी? सोचा तो लगा हाँ, काफ़ी थी! काफ़ी थी, वो सारी कोशिशें तुम्हे कुछ और पल रोकने के लिए आखिर, गुज़रे वक़्त कि तरह लोग भी ज़िन्दगी से हो कर गुज़र ही जाते हैं। -©हर्ष वर्धन सिंह तस्वीर: दी नेमसेक (2006)
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विश्वास

विश्वास एक डोर बांधी थी मैंने कभी, उसको मैंने विश्वास कहा था। उसमें मेरा महल था, ख़्वाब थे, तमाम सारे पिरोए अरमान थे। डोर में हिम्मत बंधी थी एक ओर दूसरी ओर मेरा धैर्य गठा था। नन्ही-नन्ही मेरी खुशियाँ थी, कमज़ोर सा आत्म-विश्वास था। एक दिन हक़ीक़त की कैची से उस डोर के दो टुकड़े किए गए, दुनिया में डोर नहीं बिकती पूरी, ऐसा यक़ीन मुझे दिलाया सबने। हाथों से अपने मैंने, उस डोर के कई टुकड़े किये, छोटे-छोटे! एक टुकड़े में, ख़्वाब, एक में, ख़्वाइश करीं। धीरे-धीरे मेरे आगे सब मेरे ख़्वाब, अरमान, वो महल, सारी हिम्मत, सब बिखर गए थे। समझ अब ये नहीं आ रहा टूटी वो डोर है या मेरा विश्वास? © हर्ष वर्धन सिंह

पुरानी चीज़ें | हर्ष वर्धन सिंह

पुरानी चीज़ें मोहब्बत है मुझे पुरानी तस्वीरों से, पुराने गानों से, पुरानी यादों से, मुझे अपनी हर उस चीज़ से मोहब्बत है, जो अब पुरानी हो चली है। एक उम्र गुज़ारी है मैंने उनके साथ। मेरा कैमरा, मेरी ऐनक, मेरी घड़ी मेरा ग्रामोफ़ोन, मेरी कुर्सी, मेरी प्रेमिका से ज़्यादा, मुझे अकेला इन सबने देखा है। जब मैं एकांत में बैठा संगीत सुनता हूँ। देखा है, जब घंटों मैं, अपनी कुर्सी पर ख़्याल बुनता हूँ। देखा है, ऐनक लगाए, शायरी लिखते हुए मुझे। देखा है, खिड़की से बारिश को कैमरे में समेटते हुए। देखा है, कैसे इनको ख़ुद से दूर कर दूँ? कैसे मैं रफ़्तार पकड़ लूँ? मैंने ज़िन्दगी के तमाम मुश्किल दिन बिताये हैं, अपनी इन चीजों के साथ तभी मोहब्बत है मुझे हर उस चीज़ से जो पुरानी हो चली है। © हर्ष वर्धन सिंह

शाम कि चाय

शाम की चाय मैं कभी आँक नहीं पाया कि मुझे तुमसे कितना प्रेम है। प्रेम है भी या नहीं? मुझे बस इतना विश्वास है, जब मन पीड़ा से भर जाएगा। या फिर हर कुछ ज़िन्दगी में निराधार हो जाएगा। तब भी मैं शाम की चाय तुम्हारे बिना नहीं पी पाऊँगा। © हर्ष वर्धन सिंह

समुन्दर

समुन्दर गौर किया है कभी? समुन्दर कितना अकेला है! वो जो लहरों का गीत हैं न वो गीत नहीं पुकार है उसकी। पुकार जो वो लगाता है तुमको। कभी अकेले बैठे उसके किनारे? हरदम कुछ कहता है समुन्दर वो जो पानी बहकर छूता है वो इशारा है साथ होने का वो जो तेज़ लहर के झोंके हैं वादा है, आँसू पिरोने का गौर किया है कभी? -हर्ष वर्धन सिंह

एक ख़्याल

नया कोई रिश्ता पैदा क्यों करें बिछड़ने तक गिला क्यों करें। तुम हमको दफ़ा क्यों करो हम तुमको दफ़ा क्यों करें। आज आई हो तो सुन लो आगे फिर हम मिला न करें। पहले कभी हम कह न सके अब भला कह कर क्या करें। जा रही हो तो यह सुन जाओ पलट के हमको सताया न करें। अब मिलना तो बताना ज़रूर रातों में हम करें तो क्या करें। -हर्ष वर्धन सिंह

मिट्टी का गीत

मिट्टी का मैं पुतला हूँ, जलता हूँ, पिघलता हूँ, मिट्टी का ही अंश लेकर धीरे-धीरे निखरता हूँ। तपाया गया, सताया गया, कई रातों मैं रुलाया गया। भीतर मेरे शंकर और कन्हैया। मेरे अंदर डमरू और मुरलिया। ‌जाने कितनी प्यास भरूँ मैं, जाने किसके प्राण धरूँ। एक तरफ़ मेरी करे पूजा, गमले में लगे पौध वह दूजा। मुझमें भरी है तेरी आस्था। मुझमें छिपा है तेरा रास्ता। तेरी भूल तू कहे मुझे माटी तेरी धूल तुझे मैंने है बाटी। तू चाहे आकाश पर चल दे, चाहे तू विजय विश्व पर धर ले, जिसदिन मुझको भूल जाएगा, स्वयं को तू मुझमें ही पायेगा। -हर्ष वर्धन सिंह