विश्वास
एक डोर बांधी थी मैंने कभी,
उसको मैंने विश्वास कहा था।
उसमें मेरा महल था, ख़्वाब थे,
तमाम सारे पिरोए अरमान थे।
डोर में हिम्मत बंधी थी एक ओर
दूसरी ओर मेरा धैर्य गठा था।
नन्ही-नन्ही मेरी खुशियाँ थी,
कमज़ोर सा आत्म-विश्वास था।
एक दिन हक़ीक़त की कैची से
उस डोर के दो टुकड़े किए गए,
दुनिया में डोर नहीं बिकती पूरी,
ऐसा यक़ीन मुझे दिलाया सबने।
हाथों से अपने मैंने, उस डोर के
कई टुकड़े किये, छोटे-छोटे!
एक टुकड़े में, ख़्वाब,
एक में, ख़्वाइश करीं।
धीरे-धीरे मेरे आगे सब
मेरे ख़्वाब, अरमान,
वो महल, सारी हिम्मत,
सब बिखर गए थे।
समझ अब ये नहीं आ रहा
टूटी वो डोर है या मेरा विश्वास?
© हर्ष वर्धन सिंह

Bhut badhia
ReplyDeleteशुक्रिया
DeleteBeautiful lines
ReplyDeleteधन्यवाद
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