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गुज़रता वक़्त | हर्ष वर्धन सिंह


गुज़रता वक़्त


अब
जो तुम नहीं हो
तो अक्सर सोचता हूँ मैं,
कि जितनी कोशिशें कीं
तुम्हे रोक लेने की
क्या वो काफ़ी थी?
अक्सर यूँ फ़ोन मिलाना,
बेवक़्त बातें बनाना,
यूँ मिलने की गुजारिश करना
क्या काफ़ी थी?
सोचा तो लगा
हाँ,
काफ़ी थी!
काफ़ी थी, वो सारी कोशिशें
तुम्हे कुछ और पल
रोकने के लिए
आखिर,
गुज़रे वक़्त कि तरह
लोग भी ज़िन्दगी से हो कर
गुज़र ही जाते हैं।

-©हर्ष वर्धन सिंह

तस्वीर: दी नेमसेक (2006)

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